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अग्नि और ध्यान

>> Sunday, October 4, 2009




अग्नि
कर देती है
सब कचरे को भस्म ,
समाहित कर लेती है
खुद में
फिर भी
उसकी लौ
रहती है
उत्तुग .

ध्यान भी
कर देता है
मन के विकारों का
शमन
कर देता है
शांत मन .
बना देता है
शिरोमण.

6 comments:

Apanatva 10/04/2009 8:17 PM  

gaharee soch walee kavita ato sunder .

अनामिका की सदायें ...... 10/04/2009 10:20 PM  

संगीता जी,
कितना फर्क है ना भस्म और शमन में....? कितनी गहरी बात आप ने कितनी संक्षिप्त रुप में कह दी..बहुत सुंदर अभिव्यक्ति और हमेशा की तरह आपकी रचनाओ से कुछ सीखने को मिलता है...शुक्रिया.

दिगम्बर नासवा 10/04/2009 10:25 PM  

ACHEE RACHNA .... AGNI AUR DHYAN DONO HI SHUDDHI LATE HAIN .... AATMSAAT KARLETE HAIN BURAAI KO ....

ओम आर्य 10/05/2009 1:40 PM  

एक उत्कृष्ट रचना...........आप ऐसे ही लिखते रहे......धन्यवाद!

संजय भास्‍कर 10/10/2009 12:43 PM  

आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं
मेरी शुभकामनाएं.

sanjay

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